रविवार, 17 नवंबर 2013

समस्याएं सिर्फ लड़कियों की ही नहीं

सभी पुरुषों को पीछे धकेलते हुए रानी झांसी ने कहा, कि मैं मरते दम तक अपनी झांसी नहीं दूंगी। रानी पद्मिनी, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर, जीजा बाई भी माताएं थीं। कभी लड़कियां थीं- समस्याएं थीं। एक बार की बात है कि शिवाजी की पहली पत्नी सई के भाई बजाजी को आदिलशाह ने मुसलमान बना लिया तथा उसका विवाह एक मुस्लिम स्त्री से करा दिया। बाद में उस स्त्री की मृत्यु होने पर वे पुन: हिन्दू बनकर उन्हीं में मिलना चाहते थे। किन्तु उन्हें सब अन्य हिन्दू अपने में मिलाने को तैयार नहीं थे। तब उन्हें आश्वस्त करने के लिये शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई के इस उपदेश को, कि राजा प्रजा का पिता व पालक होता है, उसे अपना समधी बना लिया जिससे समस्या हल हो गई। लड़कियों को समाज हिम्मत देगा, तो वे भी समाज को ऊपर उठाने में अपना सहयोग देंगी।

क्या आप मानते हैं कि लड़कियों का नाम ही समस्याएं बनता जा रहा है? क्या आपने अपने घर में कहीं से थकी-मांदी लौटी हुई मां, बहन को सबके लिए खाना बनाने का बंदोबस्त करते नहीं देखा? क्या आपके घर में नई दुलहिन लाने के लिये अपनी मां को हर घड़ी चिंता व जद्दोजहद करते हुए नहीं देखा? आपकी नई नवेली दुलहिन के स्वागत में उसने क्या-क्या पकवान नहीं बनाये? क्या आपने अपने तेज तपते माथे पर उसके हाथों से रखी जा रही ठंडी पट्टियों का स्पर्श नहीं सराहा? क्या आपके हाथों को पकड़कर आपको बैठाने में उसने मदद नहीं की? क्या उसने अपने हाथों से आपके मुंह में भोजन या दवा का चम्मच नहीं बढ़ाया? यदि हां, तो आप उनकी समस्याओं को क्यों बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं? वे अपनी समस्याओं को खुद भी हल कर सकती हैं- बस जरा उनकी तरफदारी तो कीजिये।

दहेज की समस्या आज लड़कियों की बनाई हुई नहीं है। उनकी अशिक्षा की समस्या आज सामाजिक वातावरण की सौगात है। उनकी असुरक्षा आज समाज के विशृंखलित हो जाने का नतीजा है। शहर बड़े होते गये।  समाज में एक-दूसरे से अपरिचय बढ़ता गया। अमीर-गरीब के भेद बढ़ गए। पुरुषों के साथ कौन सा व्यवहार उचित है, उसके कुछ गुर लड़कियों को सिखाए ही नहीं गए।  यों तो सामान्यत: पुरुष, मौके का फायदा उठाने के मन्तव्य के होते हैं। परन्तु लड़की के चौंककर गुस्से से उनकी तरफ एक नजर देखने से ही वे उड़न छू हो जाते हैं। एक घटना इस प्रकार हैं एक बार मिस टी भोपाल से दिल्ली जा रही थीं। जब वे दिल्ली उतरीं तो अकेली ही आगे कुली लेने को बढ़ीं चूंकि उनकी अटैची भारी थी। उसी समय एक पुरुष ने भी उसी कुली को रोका जिस पर इनकी नजर थी। वह पुरुष बोला, यह कुली तो दोनों का सामान (एक-एक अटैची) उठा लेगा। चलिए इसी को दोनों ले लेते हैं। कुली भी राजी था। अब सामान रखवाने के बाद साथ चलते हुए वह पुरुष बोला- 'आप यहां कहां रुकेंगी?' मिस टी बोलीं 'फलाने गेस्ट हाउस में।' वह पुरुष बोला, 'मैं भी एक गेस्ट हाउस में रुक रहा हूं, आप मेरे साथ ही रुक जाइए।' इस पर मिस टी ने चौंककर उसकी तरफ देखा और कहा, 'आपका दिमाग खराब तो नहीं है?' उस पर उस पुरुष ने अपनी अटैची कुली से खुद ले ली और वहां से अर्न्तध्यान हो गया। मिस टी ने कान पकड़े कि कभी किसी के साथ कुली का साझा नहीं करेंगी। कॉलेज के दिनों में भी याद पड़ता था बस में पुरुष लोग पास खड़े होने की कोशिश करते थे। इस तरह कि क्षण में काफी सट जाएं और दिखाएं यों कि जैसे बस के सामान्य झटकों से पास खिसकते आ रहे हों। मिस टी कभी-कभी यह हिम्मत कर लेती थीं कि पलट कर कहें, मिस्टर आप सीधे खड़े होइये। उस मिस्टर ने कभी यह नहीं कहा, कि मैं तो सीधा ही खड़ा था। बल्कि उसने भीड़ में अपना मुंह घुमाने और छुपाने की ही कोशिश की। महिलाओं को यह पते की बात मालूम होनी चाहिए कि खोटी नीयत वाले का कोई पड़ोसी साथ नहीं देता, बशर्ते मिस खुद की चौंकन्नी और दबंग हों। कुछ कहने की हिम्मत रखें।

कुछ गुर यों पुस्तकों में सिखाए जाते हैं। अगर बस में या कार में कहीं किसी अनजान पुरुष के पास बैठें तो दोनों के बीच अपना पर्स रख दें। कोई निकट आने की कोशिश करें तो बता दें, मेरे हस्बैंड या भाई मुझे लेने बस स्टॉप पर ही आ जाते हैं। कोई सिरफिरा दिखे, तो शुरू से ही अपना नकारात्मक स्वर ऊंचा रखें। यदि कोई रास्ता न दें, तो अपने पर्स से उसका कंधा थपथपायें। भीड़ में घुसना हो, तो अपनी पीठ, हाथ या कंधा पहले आगे बढ़ायें। अव्वल तो भीड़ में घुसें ही नहीं। किसी पुरुष की ओर लंबे समय तक न देखें। अर्थपूर्ण नजरों से देखने से तो आप अपने लिये खतरे को न्योता दे रही हैं। किसी अंधेरी खाली गली में अकेले न जायें। एक बार मिस टी को रात के वक्त एक से दूसरी जगह जाने में अपरिहार्य रूप से देरी हो गई। उन्होंने तुरंत अपने मोबाईल पर 100 नम्बर घुमाया। पुलिस वहां पहुंच गई। उन्होंने अपनी समस्या बताकर मदद मांगी, जिसे पुलिस मना नहीं कर सकी और मिस टी अपने घर सकुशल पहुंच गई। एक बार उन्हें एक फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में एक अकेले पुरुष के साथ का कूपा मिला। उन्होंने टीटी को बुलाकर उसे बदलवा लिया। यह और बात थी कि वह पुरुष रात के 10 बजे भी अपने मोबाईल पर फिजूल की अपनी मौज-मस्ती की बातें अपने दोस्तों को बता रहा था। शायद वह मिस टी को ही इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहा था।

मैं यह सभी पुरुषों को नहीं सुना रही, सभी एक जैसे इस प्रकार के नहीं होते। परन्तु अधिकतर को ही। एक बार तो हद हो गई। मिस टी एक बड़े अनाचार, अत्याचार और क्रूरतापूर्ण वाकये की जांच कर रही थी। उस समय वहां के एक ऊंचे पदाधिकारी ने कहा, कि इन औरतों को अकेले बसों में भरकर अपनी मांगें मनवाने के लिये पहाड़ों से नीचे ही नहीं आना चाहिए था। रात के अंधेरे में ये इधर-उधर अकेली दौड़ती मिलेंगी, तब तो हर पुरुष इन्हें पकड़कर सतायेगा ही। मिस टी ने सोचा, हाय री किस्मत। कहां गई शूरवीरों की पहचान, जो स्त्री की लल्जा को बचाने के लिए दौड़े आए थे? स्वर्ग से वस्त्र की निर्झरिणी बहा रहे थे? एक ये हैं- सब के सब कौरव हैं क्या? स्त्री ने क्या नहीं किया? सभी पुरुषों को पीछे धकेलते हुए रानी झांसी ने कहा, कि मैं मरते दम तक अपनी झांसी नहीं दूंगी। रानी पद्मिनी, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर, जीजा बाई भी माताएं थीं। कभी लड़कियां थीं- समस्याएं थीं। एक बार की बात है कि शिवाजी की पहली पत्नी सई के भाई बजाजी को आदिलशाह ने मुसलमान बना लिया तथा उसका विवाह एक मुस्लिम स्त्री से करा दिया। बाद में उस स्त्री की मृत्यु होने पर वे पुन: हिन्दू बनकर उन्हीं में मिलना चाहते थे। किन्तु उन्हें सब अन्य हिन्दू अपने में मिलाने को तैयार नहीं थे। तब उन्हें आश्वस्त करने के लिये शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई के इस उपदेश को, कि राजा प्रजा का पिता व पालक होता है, उसे अपना समधी बना लिया जिससे समस्या हल हो गई। लड़कियों को समाज हिम्मत देगा, तो वे भी समाज को ऊपर उठाने में अपना सहयोग देंगी।


बहुत कम लोग जानते हैं कि आर्य समाज के गौरवशाली व्यक्तित्व के स्वामी श्रध्दानंद के जीवन में एक सकारात्मक मोड़ उनकी पत्नी, शिवरानी के मधुर समर्पण और सविनय आचरण सहित सही बात के प्रति आग्रह के फलस्वरूप आया। असल में पहले ये एक बिगड़े रईस थे। उनके पिता जालंधर के नगर कोतवाल थे और स्वामी श्रध्दानंदजी जिनका नाम तब मुंशीराम था, अपना जीवन ऐय्याशी में बिताते थे। एक बार की बात है कि वे रात को कुछ यादा ही पीकर लौटे और उन्होंने उल्टी की, फिर उन्हें मानों होश ही नहीं रहा। जब होश आया तब उन्होंने पाया कि वे एक साफ बिस्तर पर लेटे हैं और उनकी पत्नी अपने मुलायम हाथों से अपनी बच्चे जैसे अंगुलियों से उनका माथा सहला रही हैं और उनकी तबियत पूछ रही है। उनकी तबियत ठीक नहीं थी तो पत्नी ने भी भोजन नहीं किया था। सबेरे उन्हें अपने व्यवहार पर बड़ी ग्लानि हुई। तब से उनका आचरण बदल गया। अंत में तो उन्होंने सन्यास ही ले लिया और अनेक लोगों के प्रेरणा पुरुष बने।

देशबन्धु

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