शनिवार, 22 जून 2013

प्राकृतिक कहर का सबक

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बाढ़ की त्रासदी के रूप में देश के सामने जैसा अचंभित कर देने वाला संकट खड़ा हो गया है वह सिर्फ एक दैवीय आपदा भर नहीं है। प्रकृति का यह रौद्र रूप चेतावनी देने के साथ-साथ हमें अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराने वाला है कि अगर चेता नहीं गया तो आगे भी ऐसी ही विषम परिस्थितियों से जूझना पड़ सकता है। हजारों लोगों की जान पर संकट खड़ा कर देने वाली उत्तराखंड की इस विभीषिका के साथ-साथ हाल के वर्षो में सामने आई अन्य अनेक प्राकृतिक आपदाएं यह संकेत दे रही हैं कि खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है। बाढ़, बादल का फटना, नदियों का प्रवाह बदलना, कम समय में बहुतायत बारिश, लगातार कई दिनों तक बारिश होना जैसी घटनाएं आपदाओं को नए-नए स्वरूप में हमारे सामने लाकर खड़ा कर रही हैं। आपदाओं का यह बदलता स्वरूप और मौसम की अनिश्चितता ने खतरे को और अधिक बढ़ा दिया है और केवल आपदा प्रबंधन के भरोसे रहकर इस खतरे का सामना नहीं किया जा सकता।

भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है जो इस तरह के खतरों से घिरा हुआ है। दक्षिण एशिया के अन्य देशों के साथ-साथ एशिया, लैटिन अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका भी इन खतरों से जूझ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल एसेसमेंट रिपोर्ट 2013 में इसकी पुष्टि की है कि भविष्य में ऐसी आपदाओं में न केवल वृद्धि होगी, बल्कि इसका असर विकास की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। विकासशील और निम्न आय वाले देश इससे सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।हमारे समक्ष मूल सवाल यह है कि क्या हम इन घटनाओं को महज एक प्राकृतिक गतिविधि मानते रहेंगे या फिर इस चुनौती के मद्देनजर अपनी रणनीति मजबूत करेंगे। केवल सरकारें इस चुनौती का सामना नहीं कर सकतीं। यह एक साझा संघर्ष है जिसमें उन लोगों की भी भागीदारी होनी चाहिए जो इससे प्रभावित हो सकते हैं। उत्तराखंड जैसी घटना एक व्यापक मुद्दा है, जिसका संबंध विकास बेतरतीब विकास से है। हमें इस पर चिंतित होना चाहिए कि हमारे सकल घरेलू उत्पाद का एक हिस्सा ऐसी आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। संयुक्त राष्ट्र की रपट के अनुसार पिछले 30 वर्षो में 40 देशों में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला प्रत्यक्ष नुकसान 305 अरब डालर तक पहुंच गया है। गरीब और असहाय आबादी इस नुकसान का बोझ कैसे उठाएगी? उत्तराखंड की ही बात लें तो इसके जैसा छोटा राज्य आपदाओं से होने वाले नुकसान को कैसे सहन कर सकता है? स्पष्ट है कि आपदा प्रबंधन पर खास तैयारी करने की जरूरत है। विकास और आपदा को अलग-अलग कर देखने का समय अब बीत चुका है।

विकास को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की आवश्यकता है जिसमें आपदा प्रबंधन भी एक जरूरी अंग हो। समस्त पहाड़ी राज्यों के लिए विकास का एक नया मॉडल खोजना होगा। भूकंप, भूस्खलन, अतिवृष्टि और बादल फटने जैसी घटनाओं से जूझते इलाकों की भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियों की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है कि विकास के जितने भी आयाम पहाड़ों में लाए जाएं वे इन इलाकों के भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिवेश से सीधा संबंध रखते हों। त्रासदी किसी भी तरह की हो, आपदा प्रबंधन की अपनी एक भूमिका होती है, लेकिन इससे भी अधिक जरूरी यह है कि पहले ही कुछ ऐसे उपाय कर लिए जाएं जिससे जोखिम को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके। इसके लिए केवल आपदा प्रबंधन विभाग को ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक विभागों को भी आगे आने की जरूरत है। आपदा प्रबंधन को विकास की मुख्यधारा में जोड़ना एक पहला और आवश्यक कदम होगा। सरकार अथवा निजी क्षेत्र को विकास से जुड़े हुए कार्यो को आगे बढ़ाते हुए इस पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा कि हम प्रकृति और पारिस्थितिकीय तंत्र के लिए कहीं जोखिम बढ़ा तो नहीं रहे हैं। वैसे तो आपदा प्रबंधन बुनियादी रूप से राज्यों का विषय है, लेकिन केंद्र सरकार खतरे की गंभीरता को देखते हुए राज्यों के क्षमता विकास में विशेष भूमिका निभा सकती है। यह राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने यहां आपदा प्रबंधन के ढांचे को मजबूत करें।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हालात हमें यह बता रहे हैं कि समाज को भी अपने स्तर पर ऐसे प्रयास करने चाहिए जो प्राकृतिक आपदाओं का खतरा घटाने वाले हों। यह तभी संभव होगा जब स्थानीय पंचायत एवं निकाय इस खतरे के प्रति जागरूक होंगे। ऐसे विकास का कोई मूल्य नहीं जो पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न करने वाला हो। इस सच्चाई से मुंह मोड़ने से अब काम नहीं चलने वाला कि देश में हर स्तर पर पर्यावरण की अनदेखी हो रही है। इस अनदेखी के लिए जितनी जिम्मेदार सरकारें हैं उतना ही समाज भी। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को हर हाल में रोका जाना चाहिए। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में जो स्थितियां उत्पन्न हुईं उनकी तह में जाने की जरूरत है। केवल आपदा प्रबंधन के भरोसे रहकर इस तरह के हालात का सामना नहीं किया जा सकता। यदि अभी भी समस्या की जड़ में जाने से इन्कार किया गया और यह नहीं समझा गया कि विकास के मौजूदा मॉडल को बदले जाने की जरूरत है तो इसका अर्थ है कि हम अभी भी खतरे की गंभीरता नहीं समझ रहे हैं।

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