रविवार, 30 जून 2013

बायौगैस उर्जा

 अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि एक बैरल कच्चे तेल की कीमत में एक डालर की वृद्वि होती है तो भारत के तेल आयात बिल में 425 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त व्यय जुड़ जाता है अर्थात तेल की कीमतों में वृध्दि का सीधा असर हमारे मुद्रा भण्डार पर पड़ता है।

इन दिनों तेल कीमतों में उफान जारी और जल्दी ही सार्वकालिक उचाईयो पर पहुचने की संभावना हैं, तेल की ये कीमतें हमारे घरेलू और बाहरी दोनों मोर्चो को बुरी तरह से प्रभावित करेंगी। तेल के बाद कोयला हमारे उर्जा भण्डार की महत्तवपूर्ण इकाई है। तेल और कोयला दोनों जीवाष्म ईंधन हैं जो हमारे देश की उर्जा की जरूरतों को पूरा करतें हैं लेकिन इनके भण्डार अब खत्म होने की ओर हैं जिससे ये महॅगें हो रहें हैं। इन जीवाष्म ईधनों के दहन से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे उत्पन्न हो रही ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से दुनिया भर में त्राहि त्राहि मचने वाली है। जीवाष्म ईधनों की दुर्लभता तथा ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ती समस्या ने विश्व का ध्यान उर्जा के अपारंपरिक स्त्रोंतो की ओर आकृष्ट किया है। अब कच्चे तेल की जगह बायोडीजल जैसे विकल्पों पर जोर दिया जा रहा है जिसमें खाद्य और अख्द्य तेलों का उपयोग किया जा रहा है, कोयले के स्थान पर परमाणु उर्जा और जल विद्युत परियोंजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। परन्तु इनमें खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें, परमाण्वीय रिसाव के खतरें और बड़ बॉधों से अनेक समस्याए सामने आ रहीं है।

ऊर्जा के इन स्त्रोंतो मे मौजूद अच्छाईयों और बुराईयों के बीच हमारे पास एक ऐसा संसाधान भी उपलब्ध है जो पूर्णत: निरापद है वह संसाधन है-गौवंश ! हमारे देश में उपलब्ध 22 करोड़ गौवंश हमारी उर्जा की तमाम जरूरतें पूरी करने में सक्षम है। वैसे भी हमारे देश में गौवंश प्राचीनकाल से ही ईधन और परिवहन में उर्जा का एक महत्वपूर्ण संसाधन रहा है। आज भी देश की लगभग 18 फीसदी आबादी गोबर के उपलों से अपनी ईधन की जरूरतें पूरा करती है तथा देश में उपलब्ध लगभग 1.5 करोड़ बैल गाड़ियॉ ग्रामीण परिवहन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान में वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग से गौवंश ऊर्जा अक्षय स्त्रोत बन गया है। बायौगैस उर्जा की आवश्यकता पूर्ति का एक सहज और पर्यावरण सम्मत संसाधन है इसमें पशुओं के मल,मूत्र और कृषि अवशिष्ट का उपयोग किया जाता है जो कि गॉव में सहजता से उपल्ब्ध है। बायौगैस की मदद से सम्पूर्ण ग्रामीण भारत के लिए ईधन और प्रकाश के लिए आवश्यक उर्जा की आपूर्ति की जा सकती है। बायौगैस में 60-65 फीसदी मीथेन, 35-40 फीसदी कार्बन डाय आक्साइडड, 0.5-1.0 फीसदी हाइड्रोजनसल्फाइड तथा सूक्ष्म मात्रा में जलवाष्प मौजूद रहती है। बायोगैस में किण्वन प्रयिा के जरिए गोबर तथा अवशिष्टों मे मौजूद जटिल कार्बनिक अणु मीथेन गैस में परिवर्तित हो जाते हैं जो कि एक वलनशील गैस है तथा जिसका कैलोरीमान 4800किलो कैलोरी प्रति घनमीटर है। हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 150 करोड़ टन गोबर उपलब्ध है जिससे लगभग 7 अरब घनमीटर बायौगैस उत्पन्न की जा सकती है। वर्तमान बायोगैस का उपयोग भोजन पकाने,रोशनी करने तथा जनरेटर के जरिए इंजनों को चलाने में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि देश भर में काम कर रहे छोटे बायोगैस संयत्रों के कारण प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख टन जलाऊ लकड़ी की बचत होती है। ईधन और प्रकाश के साथ छोटे,दोहरे ईंधन वाले इंजनों को भी चलाने के लिए भी बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है,इन इंजनों में 80 फीसदी डीजल को बायोगैस द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है, इस तरह डीजल की 80फीसदी तक बचत संभव हो गई है। आई आई टी दिल्ली द्वारा विकसित की गई तकनीक से कार,तिपहिया वाहनों का बायोगैस से चालन संभव हो गया है। इस तकनीक के जरिए बायोगैस में मौजूद कार्बन डाय आक्साइडड, हाइड्रोजनसल्फाइड तथा जलवाष्प को हटा दिया जाता है तथा शेष मीथेन गैस को गैस कम्प्रेशर द्वारा सम्पीड़ित किया जाता है। इस सम्पीड़ित गैस को उच्च दाब वाले स्टील सिलेंडरों में भण्डारित कर लिया जाता है फिर इन सिलेंण्डरों का उपयोग वाहनों,सिंचाई पम्पों और उद्योगों में आसानी से किया जा सकता है। एक ऑकलन के अनुसार 120 घनमीटर क्षमता के एक बायोगैस संयंत्र से प्रतिदिन 6 कि.ग्रा. के 8 सिलेण्डर भरे जा सकते हैं जिससे करीब 50 लीटर डीजल की बचत संभव है अर्थात एक वर्ष में 18000 लीटर डीजल की बचत है। मीथेन गैस की बॉटलिंग प्रयिा में 5 रूपये प्रतिकिलोग्राम की दर से व्यय आता है, इस क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञों का ऑकलन है कि एक गाय एक वर्ष में इतना गोबर देती है कि उससे तैयार होने वाली मीथेन गैस 225 लीटर डीजल के बराबर उर्जा दे सकती है। इस प्रकार हमारे देश में उपलब्ध 22 करोड़ गौवंश के जरिए उत्पन्न मीथेन गैस से कच्चे तेल की समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है। कार्बनडायआक्साइड के अनेक औद्योगिक उपयोग है जो कि वायोगैस के पृथक्कीकरण में प्राप्त होती है इसका व्यवसाय भी संभव है। रासायनिक उर्वरकों में भी कच्चे तेल का उपयोग होता है जबकि बायोगैस की स्लरी एक श्रेष्ठ उर्वरक है जो कि सस्ता और सहज उपलब्ध है। देश में उपलब्ध गोबरयुक्त बायोमास से लगभग 50 हजार मेगावाट बिजली बनाई जा सकती है। वास्तव में देश उपलब्ध गौवंश उर्जा संबंधी आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम है। बस गौवंश के संरक्षण, शोध और योजनाओं के क्रियान्वयन की जरूरत है।



Plant Biotechnology

What is Plant Biotechnology?
The origin of Biotechnology can be traced back to prehistoric times, when microorganisms were already used for processes like fermentation. In 1920’s Clostridium acetobutylicum was used by Chaim Weizman for converting starch into butanol and acetone, latter was an essential component of explosive during World War- II. This raised hopes for commercial production of useful chemicals through biological processes, and may be considered as the first rediscovery of biotechnology in the present century. Similarly, during World War-II ( in 1940’s) , the production of penicillin (as an antibiotic discovered by Alexaner Flemming in 1929) on a large scale from cultures of Penicillium notatum marked the second rediscovery of biotechnology. The third rediscovery of biotechnology is its recent reincarnation in the form of recombinant –DNA technology, which led to the development of a variety of gene technologies and is thus considered to be greatest scientific revolution of this century. Biotechnologies, as world indicate, is the product of interaction between the science and technology.
Definition of Plant Biotechnology:
1. Biotechnology is the application of biological organisms, system or processes to manufacturing and service industries.
2. Biotechnology is the integrated use of biochemistry , microbiology and engineering science in order to achieve technological application of the capabilities of micro-organism, cultured tissue cells and part thereof.
3. Biotechnology is “a technology using biological phenomenon for copying and manufacturing various kinds of useful substances.”
4. Biotechnology is “the controlled use of biological agents such as micro-organisms or cellular components for beneficial use. (U.S National Science Foundation)
Broad Categories of Biotechnology
The new biotechnology may be classified into the following four broad categories:
1. Techniques for cell and tissue culture likely to produce substantial impact on agriculture.
2. Technological development associated with fermentation processes, particularly those in the chemical sector which include the enzyme immobilization technique. These techniques are already creating some impact in several industrial branches. E.g. Production of enzymes and amino acids.
3. Techniques that apply microbiology for the screening, election and cultivation of cells and micro-organisms.
4. Techniques for the manupulation and transfer of genetic material.
Characteristics of Biotechnology
Any technological revolution usually has the following five characteristics:
1. A drastic reduction in the cost of several products and services.
2. A dramatic improvements in the technical properties of processes and products.
3. Social and political acceptability in the sense that innovation is socially accepted but it involves modification in the legislative and regulatory patterns of society and some changes in management and labour attitude.
4. Environment acceptability.
5. Pervasive effects brought the economic system.

Recent advances in biotechnology have been exploited in a variety of ways both for production of industrial , important biochemical and for basic studies in molecular biology.

शनिवार, 29 जून 2013

Socialism

Socialism defined as a centrally planned economy in which the government controls all means of production—was the tragic failure of the twentieth century. Born of a commitment to remedy the economic and moral defects of CAPITALISM, it has far surpassed capitalism in both economic malfunction and moral cruelty. Yet the idea and the ideal of socialism linger on. Whether socialism in some form will eventually return as a major organizing force in human affairs is unknown, but no one can accurately appraise its  prospects who has not taken into account the dramatic story of its rise and fall.

The term socialism is derived from the word from the word socious which means society. Socialism prior concern is society and the injustice of the capitalist system that has inspired its origin. It is aeration against social and economic anarchy which the capitalist system has had produced. It is revolt against the exploitation of man by man and of child in field, factory, mine and workshop. It is challenge to society divided into two halves or classes-haves or have not and dragged mankind into perpetual conflicts and wars. Socialism has spread worldwide and emerged many school of socialism and each school has its own name and advocated its own point of view such as Fabianism in Britain, Syndicalism in France, Guild socialism in Britain. Socialism emerged as a political movement of class which aims to abolish exploitation of capitalism by using tools of the collective ownership and democratic management relied on instrument of production and distribution. It pays attention at securing an economic objective of any country. Socialism is the organization of workers which promotes the conquest of worker class, provide them political power so as to transform capitalist property into social prosperity. Socialism consider society as a whole and promotes the general well-being for all.

History of Socialism

Thomas More coined the term "utopia" in 1515 in his treatise titled "Utopia," but utopian imaginings began long before his. Platodescribed a similar environment when he wrote the philosophical work "Republic" in 360 B.C. In 1627, Francis Bacon's "New Atlantis" advocated a more scientific approach, rooted in the scientific method. Bacon envisioned a research-institute-like society where inhabitants studied science in an effort to create a harmonious environment through their accumulation of knowledge. In addition to these landmark works, more than 40 utopian-themed novels were published from 1700 to 1850, cementing its status as a very popular ideal [source: Foner]. Because many social injustices -- such as slaveryand oppression -- were running rampant, the theme was quite popular among embittered and dispirited populations.

While a French revolutionary named François Noël Babeuf is credited with the idea of doing away with private property to create equality and is often considered the first socialist, the concept wasn't popularized until the late 1700s, when the Industrial Revolutioncaused some drastic changes around the world.

The revolution marked a shift from agricultural societies to modern industries, in which tools were eschewed in favor of cutting-edge machinery. Factories and railways sprung up, resulting in tremendous wealth for the owners of these industries. While they profited from these changes, workers were thrown into sudden poverty due to a lack of jobs as machines began to replace human labor. Many people feared that this discrepancy in income would continue to spread, making the rich richer and the poor poorer.

This fear created unrest among the working class. Poor housing, coupled with bad working conditions and slave labor (which was still rampant in the United States and other countries), contributed to the desire for a more equal society. As a result, socialist ideals quickly became popular among the impoverished workers. Communes such as Brook Farm and New Harmony began popping up in the United States and Europe. These small communities abided by socialist principles and worked to avoid the class struggles that controlled the rest of the world. New Harmony was considered a center of scientific thought and boasted the United States' first free library, public school and kindergarten.

Despite the presence of small communes and the spread of socialist thought, socialism remained largely an idea, rather than reality. Soviet dictator Vladimir Ilyich Lenin was the first leader to put socialism to the test. Though he was a communist (a branch of socialism that used militant action to overthrow the upper class and government to achieve a utopian society), Lenin implemented many socialist initiatives in the Soviet Union after his takeover in 1917. These included forced nationalization of industry and collectivization of agriculture. Lenin's programs were not profitable, and he eventually resorted to a mixed economy. Communism is sometimes referred to as revolutionary socialism for its aggressive tactics. Although there are fundamental differences between the two theories, communism and socialism both aim to eliminate class struggles by encouraging government or state control of production and distribution.

The post-World War I era saw a rise in democratic socialism in Europe. Socialist parties became active in the governments of Germany, Sweden, the Netherlands, Belgium and Great Britain. Socialism also became popular in portions of Africa, Latin America and Asia
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Forms of Socialism- There are different forms of socialism which are given below.

Utopian Socialism

Dreamers who have sought to improve our imperfect world are scattered across the pages of history. Sir Thomas More (1478--1535), a Catholic saint and martyr who served as an advisor to England's Henry VIII, was one such dreamer. More's famous book Utopia borrowed a Greek word meaning "no place." Today, utopian commonly refers to unrealistic ideals. More blamed poverty, waste, and avarice on private property, and proposed the creation of "Utopia," where everyone would share everything.

Utopian socialism is the idea that collective ownership eliminates greed and promotes personal growth, cultural enrichment, and democracy.

People would work for the common good in jobs of their choice. Prices would be superfluous, because there would be as much joy from giving as from receiving; supplying and demanding would be equally satisfying.

More's ideas were largely ignored until early in the nineteenth century, when social ferment and the prospect of revolution swept Europe. Utopian socialism bloomed. Prominent utopians of this period included the French philosopher Charles Fourier (1772--1837) and the philanthropist Robert Owen (1771--1858). Owen, though born into poverty, became wealthy as a Scottish cotton-mill owner while still in his twenties. Infatuated with the utopian vision, he financed several self-contained, communally owned villages in Scotland and the United States. Neat rows of houses, free education, better working conditions, and wages in proportion to hours worked attracted thousands of people to this grand experiment. But all utopian communities of this period were (predictably?) poorly managed and uniformly failed.
It seems ironic that some of Owen's dreams were integrated into public policies in many modern mixed economies. Free public education, socialized medicine in much of Europe and medical insurance in the United States, healthier working conditions, and substantial parts of our current welfare system can all be traced to utopian goals.

Marxian socialism

In Marxist theory, socialism, lower-stage communism or the socialist mode of production refers to a specific historical phase of economic development and its corresponding set of social relations that eventually supersede capitalism in the schema of historical materialism. In this definition, socialism is defined as a mode of production where the criterion for production is use-value, where production for use is coordinated through conscious economic planning and the law of value no longer directs economic activity. Socialism would be based on the principle of To each according to his contribution. The social relations of socialism are characterized by the working-class effectively controlling and owning the means of production and the means of their livelihood either through cooperative enterprises or public ownership and self management, so that the social surplus would accrue to the working class or society as a whole.

This view is consistent with, and helped to inform, early conceptions of socialism where the law of value no longer directs economic activity, and thus monetary relations in the form of exchange-value, profit, interest and wage labor would not operate and apply to socialism.

The Marxian conception of socialism stood in contrast to other early conceptions of socialism, most notably early forms of market socialism based on classical economics including Mutualism and Ricardian socialism, which unlike the Marxian conception, retained commodity exchange and markets for labor and the means of production. The Marxian conception was also heavily opposed to Utopian socialism.

Although Karl Marx and Fredrick Engels wrote very little on socialism and neglected to provide any details on how it might be organized, numerous Marxists and neoclassical economists used Marx's theory as a basis for developing their own models and proposals for socialist economic systems and served as a point of reference for the socialist calculation debate.

Christian socialism

Many prominent socialists were militant atheists, for example, but others expressly connected socialism to religion. Even the rationalist Saint-Simon had called for a “new Christianity” that would join Christian social teachings with modern science and industry to create a society that would satisfy basic human needs. His followers attempted to put this idea into practice, giving rise to a Saint-Simonian sect sometimes called “the religion of the engineers.” This combination of an appeal to universal brotherhood and a faith in enlightened management also animated the best-selling utopian novel Looking Backward (1888), by the American journalist Edward Bellamy. In England the Anglican clergymen Frederick Denison Maurice and Charles Kingsley initiated a Christian socialist movement at the end of the 1840s on the grounds that the competitive individualism of laissez-faire capitalism was incompatible with the spirit of Christianity. The connection between Christianity and socialism persisted through the 20th century. One manifestation of this connection was liberation theology—sometimes characterized as an attempt to marry Marx and Jesus—which emerged among Roman Catholic theologians in Latin America in the 1960s. Another, perhaps more modest, manifestation is the Christian Socialist Movement in Britain, which affiliates itself with the British Labour Party. Several members of Parliament have belonged to the Christian Socialist Movement, including Prime Minister Gordon Brown, the son of a Methodist minister, and his predecessor, Tony Blair, an Anglican who converted to Catholicism not long after he left office.

Fabian Socialism

Founded in England in 1884, the Fabian Society jettisoned the utopian ideal of small communities, urging instead nationalization of heavy industry and municipal ownership of public utilities. Otherwise, their agenda echoed many reforms proposed by utopians: universal suffrage, income redistribution, free education and medical care, and laws to ensure safe work environments, forbid child labor, and limit women's working hours.

The early Fabians included such prominent intellectuals as playwright George Bernard Shaw, science fiction writer H. G. Wells, historian G. D. H. Cole, and Sidney and Beatrice Webb, a married team of economists. This small band grew and, as it collected members who were active in the British union movement, evolved into the present Labour party, which dominated the British government from World War I until 1980. Many advocates of capitalism blamed the Labour party's policies of nationalization for technological obsolescence and the sluggish growth of the British economy. They credit massive privatization since 1980 for the modern resurgence of British industry.

Guild socialism

Related to syndicalism but nearer to Fabianism in its reformist tactics, Guild Socialism was an English movement that attracted a modest following in the first two decades of the 20th century. Inspired by the medieval guild, an association of craftsmen who determined their own working conditions and activities, theorists such as Samuel G. Hobson and G.D.H. Cole advocated the public ownership of industries and their organization into guilds, each of which would be under the democratic control of its trade union. The role of the state was less clear: some guild socialists envisioned it as a coordinator of the guilds’ activities, while others held that its functions should be limited to protection or policing. In general, however, the guild socialists were less inclined to invest power in the state than were their Fabian compatriots.

Anarcho-communism

Anarcho- communism is a theory of anarchism which advocates the abolition of the state, capitalism, wages and private property and in favor of common ownership of the means of production, direct democracy, and a horizontal network of voluntary associations and workers' councils with production and consumption based on the guiding principle: "from each according to his ability, to each according to his need".

Some forms of anarchist communism such as insurrectionary anarchism are strongly influenced by egoism and radical individualism, believing anarcho-communism is the best social system for the realization of individual freedom. Some anarcho-communists view anarcho-communism as a way of reconciling the opposition between the individual and society.

Anarcho-communism developed out of radical socialist currents after the French Revolution but was first formulated as such in the Italian section of the First International. The theoretical work of Peter Kropotkin took importance later as it expanded and developed pro-organization list and insurrectionary anti-organization list sections.

To date, the best-known examples of an anarchist communist society (i.e., established around the ideas as they exist today and achieving worldwide attention and knowledge in the historical canon), are the anarchist territories during the Spanish Revolution and the Free Territory during the Russian Revolution. Through the efforts and influence of the Spanish Anarchists during the Spanish Revolution within the Spanish Civil War, starting in 1936 anarchist communism existed in most of Aragon, parts of the Levante and Andalusia, as well as in the stronghold of Anarchist Catalonia before being crushed by the combined forces of the regime that won the war, Hitler, Mussolini, Spanish Communist Party repression (backed by the USSR) as well as economic and armaments blockades from the capitalist countries and the Second Spanish Republic itself. During the Russian Revolution, anarchists such as Nestor Makhno worked to create and defend—through the Revolutionary Insurrectionary Army of Ukraine—anarchist communism in the Free Territory of the Ukraine from 1919 before being conquered by the Bolsheviks in 1921.

Syndicalism

Near the anarcho-communists on the decentralist side of socialism were the syndicalists. Inspired in part by Proudhon’s ideas, syndicalism developed at the end of the 19th century out of the French trade-union movement—syndicat being the French word for trade union. It was a significant force in Italy and Spain in the early 20th century until it was crushed by the fascist regimes in those countries. In the United States, syndicalism appeared in the guise of the Industrial Workers of the World, or “Wobblies,” founded in 1905.

The hallmarks of syndicalism were workers’ control and “direct action.” Syndicalists such as Fernand Pelloutier distrusted both the state, which they regarded as an agent of capitalism, and political parties, which they thought were incapable of achieving radical change. Their aim was to replace capitalism and the state with a loose federation of local workers’ groups, which they meant to bring about through direct action—especially a general strike of workers that would bring down the government as it brought the economy to a halt. Georges Sorel elaborated on this idea in his Réflexions sur la violence (1908; Reflections on Violence), in which he treated the general strike not as the inevitable result of social developments but as a “myth” that could lead to the overthrow of capitalism if only enough people could be inspired to act on it.

Socialism effect on society

Positive effect of socialism -

A Fair System
Socialism gives equal distribution of national wealth and provides everyone with equal opportunities, irrespective of their, color, caste, creed or economic status. Socialism, in its truest sense, means equality by all means.

Eliminates Social Evils
Socialism reduces poverty with eatable wealth distribution. It also eliminates ill health, as it lays the foundation for the availability of proper health facilities for everyone. Socialism eliminates other forms of social deprivation too, by caring for everyone.

Reducing Disparities
Socialism reduces the social, economic, and political inequalities that exist within capitalist societies. By taking the ownerships of production units from the rich and presenting them to the workers, the government gives the workers a chance to earn more profits and thus rise to levels of economic well being.

More Humane & True
The effort to make everybody equal in economic, social, and political terms makes socialism more morally worthwhile than capitalism. It reinforces the fact that everyone was created equally and it was only through human actions that disparities arose.

Improved Standard Of Living
The idea behind socialism is to bring up the living standards of the poorest. It actually works towards raising the living standards to similar levels, as the better-off members of the respective societies.

Unity
As people work for a common cause and all the profits are shared equally, the feeling of selfishness is eliminated and a united feeling is gained. Plus, since socialism bars the difference caused on the grounds of color, sex, creed or religion, harmony and unity become the keywords for the countrymen.

Creates Better Human Resources
As all people, irrespective of their differences, are provided extensive public services and better facilities, they achieve their full potential. Better education facilities for all also help in creating better human resource. Manpower doubles, thus doubling the country’s economic growth, as everyone works towards a life of betterment.

Negative effect  Of Socialism

Unreal Theory
True socialism is an imaginative theory and cannot be implemented as it is. Today, socialism is not adopted in the same way, as it was advocated by Karl Marx and other socialists. The original form of socialism is neither preached nor practiced.

Negatively Influences Growth Of Economy
Socialism is actually economically inefficient, as it puts off entrepreneurs from generating wealth, because they usually have to pay higher taxes.

Improper Implementation
In socialist countries today, there are a handful of bureaucrats who control and use the power of the state. They redistribute and regulate wealth and decide on taxation for the people. Thus, in reality, people do not have control over wealth. This limits people’s political freedom and reverses the overall concept.

Poverty & Social Evils Are Not Eliminated
Socialism might redistribute some of the wealth of the richest members of the society to the poor, but this move does not eliminate poverty as a whole. The overall growth of economy suffers considerably. If there is not enough wealth, then distribution can be hampered.

Boosts Incompetence
As socialism provides the poorest with higher levels of income via social security payments, it deters them from working hard, if at all. It also creates a negative feeling in the minds of hard working fellows, as they gain no extra incentives for working hard. Adding to their woes, lazy people get paid equally as they do. This negatively impacts productivity and thus economic growth.

No Real Increase In Standard Of Living
Instead of improving the living standards for all, socialism actually lowers the income of the richest to reduce the divide and make them fall close to the income levels of the poorest.



रिश्तों पर छिड़ी एक बहस

मद्रास हाईकोर्ट के लिव-इन रिलेशन में त्यागने के बाद पीडिता को गुजारा भत्ता देने के आदेश पर चल रही बहस "सिक्स मैन एंड एलीफेंट" विश्लेषण से भी बढ़कर है। मौजूदा बहस में जो अहम पहलू भुला दिया गया, वह यह है कि जब एक कोर्ट अपना फैसला देता है, तो यह लिव-इन रिलेशन में अलग होने के सभी तरह के मामलों के लिए कानूनी मिसाल स्थापित करता है।
यही वो वजह है, जो न्यायालय को पंचायत के कानून से अलग करती है, जो कि एक समान गांव या समुदाय के लिए "केस-टू-केस जस्टिस" करती है। भारत न तो एक समान गांव की तरह है और न ही एक जैसा समुदाय कहीं है। यहां हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चन, पारसियों के लिए शादी, तलाक और गुजारे भत्ते के अलग-अलग कानून हैं। इसके अलावा खासतौर पर "क्रॉस रिलीजन" और सम्प्रदायों के विवाहों के लिए एक विशेष कानून भी है।
जब विवाह न होने पर (नॉन-मैरिजेज) ही गुजारा-भत्ता के आदेश दिए जा रहे हैं, तो यह फैसला सभी धार्मिक कानूनों और विशेष कानून में कारक होना चाहिए। न्यायालय कड़ाई से कानून की अनुपालना करते हुए न्याय करता है। पर कानून कई दफा अन्यायपूर्ण भी होता है। यदि कानून केवल वैधानिक विवाह टूटने पर ही गुजारा भत्ता की अनुमति देता है, तो न्यायालय को लिव-इन के पीडित के लिए न्याय करने के लिए उच्च न्यायिक विवेक को अपनाना चाहिए और वैवाहिक कानून को नुकसान पहुंचाए बिना न्याय करना चाहिए, जो कि परिवारों को बनाए रखने का कार्य करते हैं।
इसके लिए किसी महान कानूनी विद्वान की जरूरत नहीं है कि लिव-इन रिलेशन क्यों वैधानिक विवाह के बराबर नहीं हैं। एक कानूनन विवाह दाम्पत्य अधिकारों को मानते हुए बना रह सकता है। यह किसी भी एक पक्ष के चाहने पर नहीं टूट सकता (इस्लामिक शरीयत कानून को छोड़कर, जहां पति छोड़ सकता है)। लेकिन लिव-इन रिश्ता स्वेच्छा से आपसी आकर्षण से होता है, आपसी सहमति पर नहीं होता।
इसमें कोई भी पार्टनर लिव-इन रिश्ते को लागू नहीं कर सकता, पर दोनों में से कोई भी आसानी से छोड़ सकते हैं। सोचिए, अगर पुरूष की बजाय एक महिला लिव-इन छोड़कर किसी दूसरे पुरूष के पास चली जाती, तो उसके लिव-इन पुरूष सहयोगी के पास वैधानिक विवाह की तरह कोई समाधान था, मसलन दाम्पत्य अधिकारों की पुनस्र्थापन जैसा कोई समाधान। क्या इसमें कोई शक है कि विवाह आपसी सहमति का एक जुड़ाव होता है, जबकि लिव-इन में कोई भी किसी को छोड़कर जा सकता है?
तो ऎसे में यौन सम्बंध बनाना और संतानोत्पत्ति अकेले लिव-इन अफेयर्स को विवाह के बराबर कैसे बना सकता है? फिर भी जाहिर तौर पर जस्टिस करनान, परित्यक्त महिला की विपत्ति पर जाते हुए, उसे गुजारा भत्ता दिलाने की दिशा में कई कानूनी त्रुटियों में चले गए।
उन्होंने उसे गुजारा भत्ता सुनिश्चित करने के लिए नॉन-बाइंडिंग लिव-इन रिलेशन को गलती से वैधानिक विवाह के बराबर ला खड़ा किया। लिव-इन रिलेशन को वैधानिक विवाह के दर्जे के बराबर लाते हुए, जज ने असल में दोनों स्थितियों के बीच कानूनी भेद को मिटाते हुए, वैधानिक विवाहों को लिव-इन संसर्ग की दिशा में नीचे ला खड़ा किया।
इस प्रक्रिया में उन्होंने विवाह के तमाम कानूनों को न्याय करने के लिए गैर-कानूनी ठहरा दिया। इस मामले में परित्यक्त लिव-इन महिला एक हिंदू है और परित्यागी एक मुस्लिम है। यह क्रॉस लिव-इन रिलेशन है। क्या उन्होंने हिंदू या शरीयत कानून के तहत विवाह किया था या क्या उन्होंने विशेष कानून के तहत विवाह पंजीयन कराया था।
कुछ लोगों का मानना है कि क्यों न लिव-इन रिलेशन को गंधर्व विवाह की तरह देखा जाए। पहली बात तो यह कि गंधर्व विवाह हिंदू अवधारणा है और हिंदू महिला और मुस्लिम पुरूष के बीच लागू नहीं होगी। खैर, इस मसले पर निष्पक्ष विश्लेषण की जरूरत है। गुजारा भत्ता, जैसा कि कानून में है की बात तब आती है, जब एक वैधानिक विवाह टूटता है। लेकिन इस मामले में जो वैवाहिक गुजारा भत्ते के आदेश दिए गए हैं, जहां न तो विवाह हुआ और न ही अलगाव हुआ। जज ने इस बात को भी अनदेखा किया कि भारत में विवाह के कानून एक समान नहीं हैं, बल्कि विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय के लिए अलग-अलग हैं।
हिंदू विवाह कानून (1954) हिंदुओं के अलावा सिक्ख, बौद्ध, जैन पर भी लागू होता है, मुस्लिम, क्रिश्चन और पारसियों के सिवाय। पारसी विवाह कानून 1936 केवल उन्हीं पर लागू होता है। क्रिश्चियन विवाह कानून 1872 भी केवल क्रिश्चियन पर लागू होता है। ये सब कानून उसी धर्म के जोड़ों पर लागू होते हैं, दूसरों पर नहीं। हिंदू विवाह कानून हिंदू परम्पराओं के तहत हुए विवाहों को ही मान्यता देता है। ऎसा ही मुसलमानों में है, क्रिश्चियन, पारसियों में है। लेकिन विशेष विवाह कानून के तहत पंजीयन क्रॉस-रिलीजन विवाहों को मान्यता देता है। मतलब कि विशेष विवाह को छोड़कर, बाकी विवाह सम्बंधित धर्म की परम्पराओं के तहत होने पर ही मान्य होते हैं। फिर भी जस्टिस करनान का फैसला विवाह के लिए जरूरी परम्पराओं, रीति-रिवाजों को खारिज करता है। विवाह की तरह ही विभिन्न धमोंü में तलाक और गुजारे भत्ते में भी भिन्नता है।

वे यह नहीं पूछते कि इस जोड़े ने विशेष विवाह कानून के तहत पंजीकरण क्यों नहीं कराया। सवाल है कि क्या एक लिव-इन महिला मुस्लिम पुरूष से वैधानिक पत्नी से बेहतर गुजारा भत्ता प्राप्त कर सकती है? और क्या यह गुजारा भत्ता तब भी जारी रहेगा, जब वह किसी दूसरे लिव-इन और विवाह में बंध जाएगी। इस फैसले में, जो कि कानूनी मिसाल है, इस तरह की सभी स्थितियों पर गौर करना चाहिए, वरना यह सिर्फ एक पंचायती निर्णय बनकर रह जाएगा।

शुक्रवार, 28 जून 2013

साम्प्रदायिक सद्भाव

भारत एक विशाल देश है, जहां सदियों से विभिन्न धर्मों के लोग मिल-जुल कर रहते आ रहे हैं। सहिष्णुता, बहु-समाजवाद और मेल-मिलाप से रहने की समृद्ध परम्पराओं ने देश की पहचान को कायम रखा है और सभ्यता ने तरक्की की है।
  
संविधान में भारत को एक धर्म निरपेक्ष देश घोषित किया गया है और अल्पसंख्यक समुदायों के संरक्षण के लिए कई प्रावधान हैं। राज्य प्रशासन किसी विशेष धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता। सभी के लिए समान अवसरों के संबंध में संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं। कोई अपने आपको अलग महसूस न करे, इसके लिए संविधान में सभी प्रकार के सकारात्मक और एहतियाती उपायों के बावजूद भी बार-बार साम्प्रदायिक गड़बड़ियां होती रहती हैं। सरकार ने देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के प्रति अकसर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है और संविधिक, कानूनी, प्रशासनिक, आर्थिक और अन्य उपाय किए हैं।

साम्प्रदायिक सद्भाव पुरस्कार समारोह, 2009 में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने साम्प्रदायिक् सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। समारोह में उन्होंने कहा, "भारत विश्व के सभी महान धर्मों का देश रहा है। कई धर्म भारत में शुरू हुए और कई यहां आकर पनपे। इस उप-महाद्वीप में सदियों तक ऐसा अद्भुत सामाजिक और बौद्धिक वातावरण रहा है, जिसमें न केवल अलग-अलग धर्म शांतिपूर्वक साथ-साथ विकसित हुए हैं, बल्कि उन्होंने एक-दूसरे को समृद्ध भी किया है। यह हमारा पुनीत कर्तव्य है कि हम इस महान परम्परा को आगे बढ़ाएं। मैं समझता हूं कि सरकार और सभ्य समाज की संस्थाओं को निरंतर इस पर नजर रखनी चाहिए और धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। कोई भी धर्म हिंसा की इजाजत नहीं देता। कोई भी धर्म नफरत का प्रचार नहीं करता और न ही दूसरों से वैरभाव रखने की बात कहता है। जो लोग धार्मिक चिन्हों और मंचों का इस्तेमाल हिंसा, धार्मिक द्वेष और विवादों के लिए करते हैं वे अपने धर्म के सच्चे प्रवक्ता नहीं हैं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हमारे समाज सहित सभी समाजों में असामन्जस्य फैलाने वाले लोग होते हैं। इसलिए यह और भी महत्वपूर्ण है कि जो लोग आज पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं, हम ऐसे लोगों को मान्यता दें और उनकी प्रशंसा करें, जो साम्प्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के लिए नि:स्वार्थ भाव से कार्य करते हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसे विवेकशील लोगों को प्रोत्साहन दें"।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "सम्प्रदायवाद हाल के दिनों में उग्र रूप लेने लगा है। अराजकता एक दैत्य है, जिसके कई रूप हैं। अंतत: यह सभी के लिए दुखदायी है, उनके लिए भी, जो शुरू में इसके लिए जिम्मेदार होते हैं।"

सरकार ने साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनके अंतर्गत राष्ट्रीय एकता परिषद (1960 के दशक में) की स्थापना और राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव फाउंडेशन (1992) की स्थापना शामिल है तथा समय-समय पर साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने से संबंधित दिशा निर्देश भी जारी किए गए हैं।

राष्ट्रीय एकता परिषद में कई केन्द्रीय मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलावा समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिष्ठित व्यक्ति सदस्य हैं और विवादों पर विचार करने तथा उन्हें सुलझाने के लिए समय-समय पर परिषद की बैठकें होती रहती हैं। क्योंकि केन्द्र और राज्यों में निर्णय लेने वाले महत्वपूर्ण लोग इस परिषद के सदस्य हैं, इसलिए समाज के विभिन्न वर्गों की शिकायतों को धीरज से सुना जाता है।

राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव फाउंडेशन की सोच है कि भारत साम्प्रदायिक और अन्य सभी प्रकार की हिंसा से मुक्त रहे, जहां सभी नागरिक, विशेष रूप से बच्चे और युवा शांति और सद्भाव के साथ रहें। इसके लिए फाउंडेशन साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देती है, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है और सामूहिक सामाजिक कार्यों और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए विविधता में एकता की भावना का मजबूत करती है तथा हिंसा के शिकार लोगों की मदद करती है, ताकि देश की सुरक्षा, शांति और खुशहाली के लिए विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच आपस में विचार-विमर्श होता रहे। फाउंडेशन हिंसा के शिकार बच्चों को उनकी देखभाल, शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए आर्थिक सहायता देती है, ताकि उनका ठीक ढंग से पुनर्वास हो सके। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता को बढ़ावा देने के लिए फाउंडेशन या तो स्वयं या राज्य सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर कई प्रकार की गतिविधियों का आयोजन करती है। फाउंडेशन साम्प्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को पुरस्कार देती है। फाउंडेशन देश के विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच एकता और सद्भाव को मजबूत करने का कार्य करती है और अहिंसा तथा विवादों के निपटान के सिद्धांतों में विश्वास बढ़ाने के कार्यों को प्रोत्साहन देती है।

यह बात सही है कि सामप्रदायिक सद्भाव को कायम रखना और सामप्रदायिक गड़बड़ियों और उपद्रवों की रोकथाम करना तथा किसी भी ऐसी गड़बड़ी पर नियंत्रण करने और प्रभावित लोगों को सुरक्षा और राहत पहुंचाने के उपाय करना मुख्य रूप से राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। केन्द्र सरकार ने साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें रोकथाम संबंधी उपाय, प्रशासनिक उपाय, कर्मियों से संबंधित नीति और राहत तथा पुनर्वास से संबंधित उपाय शामिल हैं। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि यदि उचित सतर्कता बनाए रखी जाती है, सावधानी से योजना बनाई जाती है और आवश्यक तैयारी के साथ सभी उपाय किए जाते हैं, तो सामप्रदायिक हिंसा की कई संभावित घटनाओं को रोका जा सकता है। इसके बावजूद अगर कहीं साम्प्रदायिक हिंसा होती है, तो साहस और दृढ़ता के साथ तुरंत कार्रवाई करके इस पर कारगर ढंग से काबू पाया जा सकता है और मानवीय कष्टों को बचाया जा सकता है। जो लोग साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के शिकार हो जाते हैं, उनकी तकलीफों को दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के राहत और पुनर्वास कार्यों की समुचित योजना बनाने और विभिन्न उपायों को लागू करने पर काफी ध्यान देने की आवश्यकता है।

दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि साम्प्रदायिक उपद्रव पर बाद में काबू पाने की बजाए उसे पहले रोकना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह जिला प्रशासन का कर्तव्य है कि वह नियमित आधार पर जिले की साम्प्रदायिक स्थिति का ध्यान से मूल्यांकन करे और इस बारे में विवरण तैयार करे तथा जिले के उन इलाकों की पहचान करे, जो साम्प्रदायिकता की दृष्टि से अधिक संवेदनशील और तनावपूर्ण है। ऐसे इलाकों में पुलिस अधिकारियों को स्थिति पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, समय-समय पर लोगों से तथा विभिन्न समुदायों के नेताओं से संपर्क करते रहना चाहिए। इन इलाकों के लिए कितने पुलिस कर्मी तैनात करने की आवश्यकता है, इसका सही आकलन किया जाना चाहिए और रिक्तियां भरी जानी चाहिए। ऐसे संवेदनशील और अति-संवेदनशील इलाकों में बिगड़ी स्थिति को संभालने के लिए विस्तृत मानक कार्यवाही प्रक्रियाओं और आपात योजनाओं के साथ तैयारी रखी जानी चाहिए। लाउडस्पीकरों का बेरोक टोक इस्तेमाल विभिन्न समुदायों के लोगों के समूहों में भावनाओं और हिंसक प्रतिक्रियाओं को भड़काता है, जिसे रोकने की आवश्यकता है। आमतौर पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक जलूस साम्प्रदायिक टकराव और झड़पों का कारण बन जाते हैं, क्योंकि विभिन्न संगठन धार्मिक मौकों पर इन जलूसों के जरिए अपनी ताकत को दर्शाने की कोशिश करते हैं। इसलिए इनको नियंत्रण में रखना जरूरी है। जलूसों के शांतिपूर्ण संचालन में समुदायों के जाने-माने सम्मानित लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसी घटनाओं और जलूसों के वीडियो/ आडियो कवरेज से इन पर नियंत्रण करने में सहायता मिल सकती है। अफवाहों की रोकथाम के लिए भी कारगर और सार्थक कार्रवाई जरूरी है। सही खबरें और जानकारी देने के लिए किसी जिम्मेदार अधिकारी की ड्यूटी लगाई जानी चाहिए। यह बात सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाने चाहिएं कि पूजा के स्थलों को कोई नुकसान न पहुंचे।

मार्गदर्शक नियमों में कहा गया है कि पुलिस बल का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह जिस इलाके में तैनात किया जाए, उसकी सामाजिक रचना का प्रतिनिधित्व करे ताकि उसकी विश्वजस्तमनीयता और समाज के सभी वर्गों में आत्ममविश्वास की भावना बढ़ाने में सहायक हो सके। आम तौर पर सांप्रदायिक रूप से किसी संवेदनशील और दंगे की आशंका वाले इलाके में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की ईमानदारी, कुशलता और निष्पंक्षता तथा भेदभावरहित दृष्टिकोण काम करता है। हर सार्वजनिक सेवक को अपने में निहित कानूनी प्राधिकार का इस्ते‍माल करना चाहिए ताकि किसी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा का निवारण किया जा सके और लोगों को निष्प‍क्ष तरीके से सांप्रदायिक हिंसा से छुटकारा दिलाया जा सके और उनपर किसी प्रकार की बुरी भावना से प्रेरित कार्रवाई न की जाये। जिला प्रशासन ने दंगा निवारण और सांप्रदायिक गडबड़ी रोकने में जो सेवा की हो, उसे समुचित मान्यसता दी जानी चाहिए।

किसी सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है और इसके परिणामस्विरूप आगजनी या हिंसा होती है तो उस क्षेत्र के छोटे दुकानदार, उद्यमी और दिहाडी वाले श्रमिकों को जान-माल के नुकसान की सबसे ज्यादा आशंका होती है। अधिकांशत: आर्थिक नुकसान भी उन्हें ही झेलना पड़ता है और इनमें से ज्याकदातर किसी बीमा कंपनी द्वारा लाभान्वित भी नहीं होते। यही कारण है कि ये लोग उस इलाके में शांति और सद्भाव बनाये रखना चाहेंगे। इसी प्रकार से, महिलाएं ऐसी स्थिति में सबसे ज्याउदा तकलीफ उठाती हैं अत: वे भी उस इलाके में शांति और सद्भाव बनाये रखना चाहेंगी। जिला प्रशासन इन लोगों/ग्रुपों की ऊर्जा से लाभ उठा सकता है और शांति सुनिश्चित कर सकता है।

देश के अधिकांश स्वैाच्छिक संगठन शांति, राष्ट्रीय अखंडता और सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने के लिए काम कर रहे हैं। अधिकांशत: इन संगठनों के पास ऐसे उत्साकही और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं जिनकी नीयत सही होती है। जिला प्रशासन को इन लोगों का समर्थन जुटाना चाहिए और सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने के लिए उनका सहयोग लेना चाहिए। अगर जरूरी हो तो स्थिति को नियंत्रित करने में भी उनका सहयोग लेना चाहिए। अगर किसी तरह की सांप्रदायिक गडबड़ी की आशंका हो या गडबडी हो जाये, तो तुरंत निवारक कदम उठाये जाने चाहिए जिनमें निषेधाज्ञा/ कर्फ्यू लागू करना और उसपर तटस्थ होकर अमल कराना जरूरी है। सांप्रदायिक हिंसा/दंगे से जुडे सभी अपराधों के मामलों पर नजर रखी जानी चाहिए और जब भी जरूरी हो निष्प्क्ष और तटस्थं छानबीन सुनिश्चित करने के लिए विशेष अन्वेतषण टीम बनाई जानी चाहिए।

दंगा पीडितों को अगर ठीक समय पर राहत/अनुग्रह राशि नहीं मिलती तो इसके चलते काफी गुस्सान किया जाता है। अंतरिम राशि सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को तुरंत दी जानी चाहिए और ऐसी राशि देते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लिंग, जाति, समुदाय अथवा धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न होने पाये। जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ठीक समय पर खाने पीने की चीजें/सेवाएं उपलब्धप कराई जायें और दूघ, दवाएं, पानी और बिजली आदि दंगा पी‍डित इलाके में उपलब्धर रहें। जब भी जरूरत हो, राहत शिविर खोले जाने चाहिए जिनमें चिकित्सा जांच/सहायता की सुविधा उपलब्घक हो। जब भी जरूरी हो और अगर आवासीय या वाणिज्यिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा हो, तो बीमा संबंधी मामले निपटाने के लिए उपयुक्तआ व्यावस्था् उपलब्धह होनी चाहिए। अगर जरूरी हो तो वित्ती य संस्थााओं से ऋण सुविधाएं भी उपलब्धु होनी चाहिए।

केंद्र सरकार ने आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों की मदद के लिए एक केंद्रीय योजना शुरू की है। इसके अंतर्गत पीडित परिवारों को तीन लाख रूपये की एकबारगी अदा की जाने वाली राशि दी जाती है। इसके अलावा भी अनुग्रह राशि आदि उपलब्धक कराई जा सकती है।

सरकार ने एक कानून बनाया है जिसका उद्देश्यी धार्मिक स्थागनों की गरिमा बनाये रखना और राजनीतिक, आपराधिक, षडयंत्रकारी अथवा सांप्रदायिक उद्देश्यों के लिए इनका इस्तेरमाल रोकना है। कानून के अनुसार इसके बारे में पुलिस को सूचना देना प्रबंधक की जिम्मेथदारी है। इस कानून के अनुसार किसी पूजा स्थसल के अंदर हथियार जमा करना भी मना है।

पूजा स्थदल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 ऐसा कानून है जो किसी पूजा स्थनल को अन्यि रूप में बदलने पर रोक लगाता है और पूजा स्थ ल का वही धार्मिक स्व रूप बनाये रखना सुनिश्चित करता है जो 15 अगस्त 1947 को था। तदनुसार, न तो किसी धार्मिक संस्थाखन का प्रबंधक उसे राजनीतिक गतिविधियां चलाने के लिए उपलब्ध करा सकता है, और न ही किसी ऐसे व्यीक्ति को जिस पर किसी आपराधिक गतिविधि का आरोप है, अथवा उसे आपराधिक गतिविधि में सजा मिल चुकी है, को वहां छिपने दे सकता है। इसी तरह से किसी उपासना स्थाल के अंदर न तो कोई हथियार जमा किया जा सकता है और न ही उसकी किलेबंदी की जा सकती है। किलेबंदी करने में बिना इजाजत या लाइसेंस लिये तहखाने बनाना, टॉवर या ऊंची दीवारें खडा करना शामिल है। ऐसे परिसरों को कानून के अंतर्गत मना की गई गतिविधियां चलाने के लिए इस्तेामाल नहीं किया जा सकता। वहां से ऐसी गतिविधियां भी नहीं चलाई जा सकती जिनसे सांप्रदायिक सद्भाव बिगडता हो, या किसी धार्मिक, जातीय, भाषा संबंधी अथवा क्षेत्रीय समूह, जाति अथवा समुदाय के प्रति दुर्भाव फैलता हो।

सभी धर्म मूल रूप से प्यार और भाईचारे की भावना बढाते हैं। अगर किसी भी धर्म का मूल सिद्धांत इस प्रकार का है तो दुर्भाव, नफरत अथवा हिंसा की गुंजाइश कहां बचती है? स्पष्ट है कि कुछ लोग धार्मिक शिक्षाओं का अपने स्वारर्थ, निजी महत्वाकांक्षाओं और लाभ के लिए गलत व्या्ख्या् करते हैं। यह सर्वविदित है कि आम तौर पर सांप्रदायिक गडपबडी छोटी और मामूली घटना को लेकर शुरू होती है और निहित स्वायर्थ वाले लोग इसे बडा रूप दे देते हैं।

भारत एक विकासशील देश और उभरती अर्थव्यवस्था है। हमारे नेताओं ने इसे एक विकसित देश और आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना देखा था। यह सपना तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक देश की आंतरिक शांति व्यवस्था और खास तौर से सांप्रदायिक सद्भाव बना न रहे। सांप्रदायिक शांति और सद्भाव बनाये रखने पर सरकार को काफी ऊर्जा खर्च करनी पडती है और अगर शांति व्यावस्थाभ बनी रहती है तभी विभिन्नख सांप्रदायिक वर्गों के बीच विश्वास बढेगा। ऐसा होने पर ही देश विकास और आर्थिक प्रगति के रास्‍ते पर आगे बढ़ पायेगा।



Foreign Direct Investment and Economic Growth

Paul Theroux in his book, ‘Riding the Iron Rooster’ has made some fascinating comments on China which can help us in trying to understand why China is today an economic power-house and India is still struggling. This book was written in 1988 and describes a series of train journeys that Theroux undertook across China in trains which were obviously not the new Bullet Trains that China has now introduced.

Starting from Victoria Station in London Theroux travels across Europe, Russia, and Mongolia and then enters China through Inner Mongolia, making landfall at Datong. After the emptiness of Mongolia Theroux finds Datong and the China it represents to be shabby, busy, disorderly, very crowded and thoroughly polluted by smog which was a combination of desert dust, fog and industrial smoke. The shops were full of goods; there was an air of prosperity, but coal as the source of energy and manufacture, especially of steam locomotives, created a lasting impression. The industrial process was not automated, but everyone was busy working. The guiding philosophy was the three great goals of the workers. To quote Theroux these goals were, “timing of production, so that no work was wasted; keeping the right mental attitude; and increasing productivity”
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I have begun this paper by referring at some length to the very first impression that Paul Theroux had when he entered China from Mongolia. It was one of a country which has industries, whose people had a mindset of production and whose government obviously had a commitment to manufacturing. After the revolution Mao Tse Tung deliberately fostered an economic policy which strove to build a huge manufacturing sector in the country so that China could become an industrialised nation. Remember the slogan that China would overtake America in steel production? The huge number of backyard furnaces that came up and produced very low quality pig iron was a part of this effort to industrialise. Not much pig iron was produced this way, but the people were weaned away from a rural psyche to one in which manufacturing became central to the economy. It must be remembered that in China only ten percent of the total land area is cultivable and more than sixty percent of the land consists of uncultivable wasteland. Geology, geography, topography, hydrology and soil morphology encouraged, in fact mandated, that China could not continue to prosper on the basis of agriculture alone. The industrial revolution in China was then an inevitable consequence of the land configuration, though to give Mao credit he hastened the transition from a basically subsistence rural economy to a very powerful industrial economy.

Industrialisation carries with it a number of prerequisites, sequential growth of support infrastructure, capital requirement and capital formation and research and development which would lead to invention, innovation and improvement. Industry cannot survive without power and the development of the power sector becomes a sine quo non for industrialisation. The development of communications so that goods, people and services can be transported over long distances is absolutely essential for industrial growth. Because a country starting from a low level of economic capability does need assistance for capital formation and for development of technology, China had to find partners. Therefore, despite the fact that China is a Communist country whose ideal is socialism and State ownership of the means of production, China opted for an open door policy in which foreign investment was welcomed and the off-shoring of foreign industry and its location in China was encouraged. China provided the land space and labour and many of the world industries established a base in China. A great deal of Chinese industrial grown has taken place because of this open door policy. The Chinese Government at no stage felt that it could not keep the multinational corporations under control and, therefore, the Chinese had no hesitation in letting in foreign capital. Despite the handicap of having a one-party rule and a judicial system which is certainly not Anglo Saxon, China has been able to reassure the foreign investor that his investment would be safe.

Let us contrast this with India. We have always been suspicious of foreigners coming and investing in India because after all the East India Company and its Dutch, French, Portuguese and Danish counterparts initially came to India for trade. Because of a succession of wars in Europe in which Britain emerged as the dominant naval power and also a great military power on land, the French, Portuguese and other European interventions in India were virtually liquidated and Britain emerged as the supreme European power. Starting from trading posts such as Bombay, Surat and Calcutta the British trader gradually grew into being an arbiter in matters of local, native administration and the East India Company expanded into an imperial power. These memories are fresh in the Indian mind and, therefore, the Indian people and the Indian politicians have always had a deep- rooted suspicion and antipathy towards the successors to the East India Company, the multinational corporations. That is why there is strong political opposition to allowing foreigners to come and take over our companies, our manufacturing units and our trade outlets. Surprisingly China, which calls itself a Peoples Republic and has the single party rule of the Communist Party of China, is today most openly capitalist and gives the warmest possible welcome to foreign investors. India, on the other hand, is a multi-party democracy in which the word “socialist” used in the Preamble to the Constitution is more a comforting slogan than a political commitment, but we are still hostile to the idea of foreigners participating in our economy because we still feel that Surat may become the base of a foreign empire. That does explain why there is such strong political revulsion whenever the question of opening up of our market to foreigners comes up for discussion.

Trade created an empire in India and, subsequently, this empire systematically destroyed such manufacturing capabilities that India had so that the factory-made goods of Britain may be sold in the Indian market and India may then be reduced to the position of a supplier of primary products to Britain. Despite this history the Government of India has decided to open up two sectors of the Indian economy to Foreign Direct Investment. These are retail trade and the civil aviation sector, the latter named being in absolute shambles because of mismanagement. Foreign Direct Investment in the retail sector is strongly opposed by the Left, BJP, Trinamool Congress and several such parties, some of which are a part of the present Congress led coalition. The argument advanced by government is that foreigners taking over the aviation industry will pump necessary working capital into the system and this part of the economy would revive. Similarly, Foreign Direct Investment in retail trade would cut out middlemen, create the infrastructure which would enable the supply chain to reach from the farmer right up to the customer in the retail store and would bring direct benefit to the cultivators while ensuing good quality of the produce and a reasonable price for the urban consumers. It is argued that the present system of agricultural production and marketing is such that there is considerable wastage of agricultural produce by inappropriate storage, spoilage and even destruction through putrefaction in the process of transporting the produce from field to market. The foreign investment retail chains would reach out directly to the producer, create adequate storage, including cold storage facilities and build an efficient transport system which would quickly bring goods to the retail stores. This would put more money in the hands of farmers, prevent wastage and enable the consumer to buy agricultural products at an affordable price. The fact that it would throw a very large number of small vendors, road side hawker and itinerant sellers who carry fruits and vegetables on hand carts right up to the doorstep out of a job does not seem to bother our American Business School, World Bank trained or oriented economists and policy makers.

We seem to be quite willing to allow foreign investors to invest capital, including working capital, in airline companies, most of which are utterly mismanaged. Why do we not encourage foreign investors like British Aerospace, Boeing, Dassault, etc., to invest in producing aircraft in India? Why do we not try and have foreign companies invest in building factories for producing the refrigeration equipment which keeps cold storage plants functional? In other words, why do we not encourage foreign companies to invest in the secondary sector in a big way in India? We have had a fair amount of success in the Build, Operate and Transfer model (BOT model) of road construction and certainly on highways such as that which connects Bhopal to Indore the BOT model has enabled a first rate road to be built. If a sufficiency of off-shoring of manufacturing facilities is done in India we would certainly be able to create more gainful employment, India would be able to evolve an industrial culture instead of the present satisfaction with trading and as our manufacturing capacity increases, we would become a major industrial power, economic power and military power. Obviously we need to take a fresh look at our policy relating to Foreign Direct Investment in India. Given the choice I would cut down all FDI in retail trade, the service sector such as running an airline and in real estate. I would have an open door policy towards investment in the secondary sector, including the setting up of hundred percent foreign owned manufacturing facilities in India. I would certainly give meaningful incentives for investment in physical infrastructure. My only restriction would be that employment generated by these activities would go to the citizens of this country so that their earning and welfare are enhanced.

The great advantage of having a powerful industrial economy is that it forces the manufacturing companies to invest in more research and development because if they do not improve, innovate and invent, their products will become unsaleable in the market. Therefore, industrial growth will bring about simultaneous growth in scientific research for the purpose of innovation and invention. This, in turn, will strengthen our institutions of technology and management because as industry grows, as the need for research grows, the market for these disciplines will expand, the research and development establishment will become stronger and the Institutes of Technology and Management will be forced to redesign teaching methodologies to keep up with the new demand.


My final words would be that government must realise that so far as the foreign direct investor is concerned, he would prefer an activity in which his own capital investment is miniscule, there is a quick turnover of commodities and, therefore, profits are earned almost simultaneously with trading. The gestation period in envisaging, constructing, commissioning of an industrial establishment and then going into commercial production is quite long and profit would have to be deferred to an appropriate date in the future. That is why in India trade is more attractive than manufacture. This would be true of the foreign direct investor also. We need to break this mindset, to make the industrialist realise that waiting for profit is not such a bad idea after all because the production capacity created will yield results year after year after year and that a well managed industrial enterprise will always be more profitable than just trade, whilst being less risky because it is unlikely to be affected by daily market fluctuations which retail trade has to face. Therefore, let economic reforms be targeted at opening up our economy to productive investment but not indiscriminately to trade. America and the developed world want exactly the opposite to happen and this we must resist.

गुरुवार, 27 जून 2013

मैंग्रोव

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति-2006 में यह माना गया है कि मैंग्रोव एक महत्वपूर्ण समुद्रतटीय पर्यावरण संसाधन है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय मैंग्रोव के संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता है, जो समुद्री प्रजातियों के लिए स्थान उपलब्ध कराता है, अत्यधिक प्रतिकूल मौसम से बचाव करता है और सतत पर्यटन के लिए एक संसाधन तैयार करता है। सरकार देश में नियामक और संवर्धक दोनों उपायों के द्वारा मैंग्रोव को बनाए रखना चाहती है।

 मैंग्रोव क्या है ?

 मैंग्रोव ऐसे पौधे हैं जो अत्यधिक लवणता, ज्वारभाटा, तेज हवा, अधिक गर्मी और दलदली भूमि में भी जिंदा रह जाते हैं। इन स्थितियों में अन्य पौधों के लिए जिंदा रह पाना मुश्किल होता है। मैंग्रोव की पारिस्थितिकी में स्थलीय और समुद्री पारिस्थितिकी के बीच एक सेतु-सा प्रतीत होता है। मैंग्रोव समुद्र के छिछले किनारे, लैगूनों और दलदली भागों वाले ज्वारभाटा क्षेत्रों में पाया जाता है। सभी समुद्रतटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मैंग्रोव लगाए गए हैं। भारत में विश्व के कुछ सर्वश्रेष्ठ मैंग्रोव पाए जाते हैं। देश में मैंग्रोव के सर्वाधिक आच्छादन में पहला स्थान पश्चिम बंगाल का है और उसके बाद गुजरात तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का स्थान है। हालांकि सभी समुद्रतटीय क्षेत्र मैंग्रोव लगाए जाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि मैंग्रोव के लिए लवणीय और ताजा जल के एक समुचित मिश्रण और दलदल की जरूरत होती है। सरकार ने देश भर में सघन संरक्षण और प्रबंधन के लिए मैंग्रोव के 38क्षेत्रों की पहचान की है। तमिलनाडु में पिचावरम, मुथुपेट, रामनाड, पुलीकाट और काजूवेली जैसे मैंग्रोव क्षेत्रों की पहचान की गई है।

मैंग्रोव समुद्रतट का रक्षक है।

 मैंग्रोव पारिस्थितिकी प्रणाली जैव-विविधता से परिपूर्ण है और यह बाघ, डॉल्फिन, घड़ियाल आदि जैसी जोखिम वाली प्रजातियों सहित अन्य बहुत-सी प्रजातियों की शरणस्थली है, जिसमें स्थलीय और जलीय दोनों प्रजातियां शामिल हैं। मैंग्रोव फिन मछली, शेल मछली, क्रस्टासिन और मोलस्कों के लिए रहने का स्थान भी है। इन पारिस्थितिकी प्रणालियों द्वारा समुद्रतटीय जल में बड़ी मात्रा में जैविक और अजैविक पोषक तत्वों के निष्कर्षण के कारण मैंग्रोव के वनों को विश्व में सर्वाधिक उत्पादक पारिस्थितिकीय प्रणाली के रूप में जाना जाता है।

 कई प्रकार की पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान करने के अलावा मैंग्रोव समुद्रतटीय क्षेत्रों को कटाव, ज्वारभाटा और सुनामी से बचाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यह भूमि उपचय के संदर्भ में मददगार है। मछली के अलावा यह शहद, मोम और वृक्ष से प्राप्त क्षार का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है। वर्तमान में कृत्रिम और प्राकृतिक दोनों ही घटकों के कारण यह सर्वाधिक जोखिम वाली पारिस्थितिकियों में से एक है।

 आठ राज्यों में सघन संरक्षण

 मौजूदा आकलन यह दर्शाते हैं कि देश में 4,662.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मैंग्रोव से आच्छादित है। देश भर में प्रतिवर्ष औसतन 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मैंग्रोव लगाए जाने का लक्ष्य रखा गया है। ये क्षेत्र पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा सघन संरक्षण के लिए पहले से चयनित 38 क्षेत्रों में शामिल हैं। वर्ष 2010-11 के दौरान मैंग्रोव के संरक्षण और प्रबंधन के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गोवा और गुजरात को 7.10 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी गई थी।

 प्रारंभिक तौर पर भारत सहित आठ देशों को शामिल करते हुए इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की ओर सेभविष्य के लिए मैंग्रोव: समुद्रतटीय पारिस्थितिकीय संरक्षण में निवेश को बढ़ावा देने के लिए रणनीतिनामक परियोजना में समन्वय कर रहा है।




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